रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने चार साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी को लेकर अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की डिवीजन बेंच ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने का निर्देश दिया है।
अदालत ने बच्ची की कम उम्र और उसके सर्वोत्तम हित को ध्यान में रखते हुए कहा कि इस उम्र में उसे मां के प्यार और स्नेह की विशेष जरूरत है। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि बच्ची का जन्म IVF के जरिए हुआ था और मां ने इस प्रक्रिया में पीड़ा और त्याग सहा है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने पिता के मुलाकात के अधिकार को भी बरकरार रखा है। उन्हें हर सप्ताहांत सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बच्ची से मिलने की अनुमति दी गई है।
2017 में हुई थी शादी, IVF से बेटी का जन्म
मामले में शामिल पति-पत्नी दोनों विनोबा भावे यूनिवर्सिटी, हजारीबाग में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। दोनों की पहले भी शादी हो चुकी थी। पहली शादी से तलाक के बाद दोनों ने 16 मई 2017 को शादी की थी।
परिवार बढ़ाने के लिए दोनों ने आपसी सहमति से IVF का सहारा लिया। इसके बाद 8 मार्च 2022 को बेटी का जन्म हुआ।
मां ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद उसे शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और बाद में उसे ससुराल से बाहर कर दिया गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि पिता ने उसे बच्ची से मिलने से रोक दिया।
वहीं, पिता ने इन आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि मां खुद बच्ची को छोड़कर अपनी इच्छा से घर से चली गई थी।
फैमिली कोर्ट ने खारिज की थी अंतरिम कस्टडी की मांग
मां ने Guardians and Wards Act, 1890 की धारा 12 के तहत बच्ची की अंतरिम कस्टडी की मांग की थी। हजारीबाग फैमिली कोर्ट ने 27 नवंबर 2025 को उनकी याचिका खारिज कर दी थी।
हालांकि, फैमिली कोर्ट ने मां को बच्ची से मिलने का अधिकार दिया था। कोर्ट ने यह भी माना था कि छोटी बच्ची को माता-पिता दोनों के प्यार और स्नेह की जरूरत है।
इसके बाद मां ने फैमिली कोर्ट के आदेश को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी।
बच्चे का कल्याण सबसे ऊपर: हाईकोर्ट
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि कस्टडी और गार्जियनशिप के मामलों में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि माता-पिता में से किसका कानूनी अधिकार अधिक है। सबसे महत्वपूर्ण पहलू बच्चे का कल्याण और उसके सर्वोत्तम हित हैं।
अदालत ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 13 और Guardians and Wards Act की धारा 12 समेत संबंधित कानूनी प्रावधानों का उल्लेख किया।
कम उम्र को देखते हुए मां की कस्टडी को प्राथमिकता
हाईकोर्ट ने बच्ची की उम्र को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत के अनुसार बच्ची करीब चार साल छह महीने की है और इतनी कम उम्र में उसे मां के स्नेह और देखभाल की विशेष जरूरत है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस उम्र में बच्ची इतनी सक्षम नहीं है कि अपने हित या पसंद को पूरी तरह समझकर स्वतंत्र निर्णय ले सके।
अदालत ने बच्ची के IVF के जरिए जन्म और मां द्वारा इस प्रक्रिया में सहन की गई पीड़ा व त्याग को भी मामले की परिस्थितियों में ध्यान में रखा। इन सभी पहलुओं को देखते हुए हाईकोर्ट ने मुख्य कस्टडी/गार्जियनशिप मामले का अंतिम फैसला होने तक बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां के पास रखने का निर्देश दिया।
पिता हर सप्ताहांत कर सकेंगे मुलाकात
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंप दी है। हालांकि, पिता को बच्ची से मिलने का अधिकार भी दिया गया है।
कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, पिता हर सप्ताहांत सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक बच्ची से मुलाकात कर सकेंगे। मुलाकात की आवश्यक व्यवस्था की जाएगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि बच्ची की पढ़ाई प्रभावित न हो।

