हैदराबाद: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने अपने निजीकरण को लेकर मीडिया में चल रही खबरों और अटकलों को पूरी तरह खारिज कर दिया है। 6 सितंबर 2026 को जारी आधिकारिक बयान में इसरो ने स्पष्ट किया कि एजेंसी का न तो निजीकरण किया जाएगा और न ही अंतरिक्ष कार्यक्रम में उसकी भूमिका कम होगी। इसके उलट, भविष्य में एडवांस्ड रिसर्च, रणनीतिक मिशन और अत्याधुनिक अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में इसरो की जिम्मेदारी और मजबूत होगी।
मुख्य बिंदु
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ISRO ने निजीकरण से जुड़ी खबरों को बताया बेबुनियाद और गलत
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अंतरिक्ष कार्यक्रम में इसरो की केंद्रीय भूमिका बनी रहेगी
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परिपक्व तकनीकों के उत्पादन और कमर्शियलाइजेशन में निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ेगी
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इसरो का फोकस एडवांस्ड रिसर्च और फ्रंटियर मिशनों पर होगा
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2020 के बाद देश में स्पेस स्टार्टअप्स की संख्या 450 से ज्यादा हुई
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2033 तक भारत की स्पेस इकोनॉमी को 44 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य
निजीकरण की खबरों पर इसरो ने दी सफाई
पिछले कुछ दिनों से ऐसी खबरें सामने आ रही थीं कि सरकार इसरो के कुछ मैन्युफैक्चरिंग और ऑपरेशनल कार्यों को निजी कंपनियों या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों (PSU) को सौंप सकती है। इन रिपोर्ट्स में IN-SPACe के चेयरमैन पवन गोयनका के बयान का भी हवाला दिया गया था, जिसमें भविष्य में लॉन्च व्हीकल के निर्माण में निजी क्षेत्र और पीएसयू की भूमिका बढ़ने की बात कही गई थी।
इसके बाद इसरो के कर्मचारी संगठनों ने भी संगठन की भविष्य की भूमिका और सरकार की अंतरिक्ष नीति को लेकर चिंता जताई थी। 4 सितंबर को नौ कर्मचारी संघों ने इसरो प्रमुख वी. नारायणन को पत्र लिखकर इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करने की मांग की थी।
GSLV-F17 लॉन्च के बाद बढ़ी चर्चा
4 सितंबर को करीब आठ महीने के अंतराल के बाद इसरो ने GSLV-F17 रॉकेट के जरिए EOS-05 सैटेलाइट को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया। इस लॉन्च के बाद इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने कहा था कि भारत के स्पेस इकोसिस्टम और स्पेस इकोनॉमी का विस्तार जरूरी है।
उन्होंने बताया था कि देश में फिलहाल 56 सैटेलाइट हैं, जबकि भविष्य की जरूरत सैकड़ों सैटेलाइट की होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकार के सुधारों का उद्देश्य उद्योग की भागीदारी बढ़ाना है और इसरो इसमें सहयोग की भूमिका निभा रहा है।
‘इसरो का महत्व कम नहीं होगा’
इसरो ने अपने आधिकारिक एक्स अकाउंट पर जारी विस्तृत बयान में कहा कि निजीकरण से जुड़ी बातें गलत हैं। एजेंसी ने स्पष्ट किया कि वह भारत का प्रमुख अंतरिक्ष संस्थान बना रहेगा।
इसरो एडवांस्ड स्पेस रिसर्च, नई तकनीकों के विकास, राष्ट्रीय और रणनीतिक मिशन, स्पेस साइंस, एक्सप्लोरेशन और फ्रंटियर स्पेस क्षमताओं के विकास पर लगातार काम करता रहेगा।
एजेंसी के मुताबिक, निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने का अर्थ इसरो की भूमिका कम होना नहीं है। बल्कि इससे इसरो को अगली पीढ़ी के अंतरिक्ष कार्यक्रमों और अत्याधुनिक तकनीकों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा।
परिपक्व तकनीक का उत्पादन करेगा उद्योग
इसरो के अनुसार, जिन तकनीकों का विकास और परीक्षण पूरा हो चुका है, उनके बड़े पैमाने पर उत्पादन और व्यावसायीकरण में उद्योग और पीएसयू की भूमिका बढ़ाई जा सकती है। इससे इसरो के वैज्ञानिकों को एडवांस्ड रिसर्च और चुनौतीपूर्ण अंतरिक्ष अभियानों पर ज्यादा ध्यान देने का अवसर मिलेगा।
भविष्य में इसरो की प्रमुख भूमिका फ्रंटियर रिसर्च एंड डेवलपमेंट, एडवांस्ड टेक्नोलॉजी, मानव अंतरिक्ष उड़ान, नेक्स्ट-जेनरेशन लॉन्च सिस्टम, डीप-स्पेस और प्लैनेटरी मिशन तथा रणनीतिक क्षमताओं के विकास में रहेगी।
Space Vision 2047 के बड़े लक्ष्य
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के तहत आने वाले वर्षों के लिए कई महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं:
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2035 तक भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (Bharatiya Antariksh Station) स्थापित करना
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2040 तक भारतीय क्रू मिशन को चंद्रमा तक भेजना
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नेक्स्ट-जेनरेशन और रियूजेबल लॉन्च सिस्टम विकसित करना
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लगातार चंद्र और ग्रहों से जुड़े मिशनों को आगे बढ़ाना
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भारत को प्रमुख वैश्विक स्पेस पावर के रूप में स्थापित करना
सरकार, ISRO, IN-SPACe और NSIL की अलग-अलग भूमिका
इसरो ने बताया कि अंतरिक्ष क्षेत्र में अलग-अलग संस्थाओं की जिम्मेदारियां स्पष्ट हैं। डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस नीतिगत दिशा तय करेगा, जबकि इसरो एडवांस्ड रिसर्च एंड डेवलपमेंट और राष्ट्रीय मिशनों पर ध्यान देगा।
वहीं, IN-SPACe गैर-सरकारी संस्थाओं और निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने में मदद करेगा। NSIL का फोकस अंतरिक्ष तकनीकों के कमर्शियलाइजेशन पर रहेगा। महत्वपूर्ण अंतरिक्ष बुनियादी ढांचे का स्वामित्व सरकार के पास ही रहेगा।
450 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स
इसरो ने बताया कि 2020 तक भारत में स्पेस सेक्टर से जुड़े स्टार्टअप्स की संख्या काफी कम थी, लेकिन अब देश में 450 से ज्यादा स्पेस स्टार्टअप्स काम कर रहे हैं।
भारत की मौजूदा स्पेस इकोनॉमी करीब 8.4 अरब डॉलर की बताई गई है। इसे 2033 तक बढ़ाकर करीब 44 अरब डॉलर करने का लक्ष्य रखा गया है। इसरो ने स्पष्ट किया कि इस पूरे विस्तार के केंद्र में उसकी भूमिका बनी रहेगी और वह भारतीय स्पेस इकोसिस्टम को बड़े स्तर पर तकनीकी एवं संस्थागत सहयोग देता रहेगा।

