पटना। बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव परिणाम के बाद सत्ताधारी NDA के दो प्रमुख सहयोगी दल भाजपा और जदयू के बीच राजनीतिक खींचतान तेज हो गई है। खासकर सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू उम्मीदवारों की हार ने गठबंधन के भीतर अविश्वास की स्थिति पैदा कर दी है। जदयू नेताओं को आशंका है कि चुनाव के दौरान भाजपा के कुछ नेताओं ने पर्दे के पीछे से निर्दलीय उम्मीदवारों की मदद की। इस मुद्दे पर पार्टी के अंदर नाराजगी बढ़ रही है। अब सबकी निगाहें 5 नवंबर को होने वाली जदयू की समीक्षा बैठक पर टिकी हैं। माना जा रहा है कि इस बैठक के बाद पार्टी भाजपा को कोई कड़ा राजनीतिक संदेश दे सकती है।
तीन सीटों पर हार से बढ़ी जदयू की चिंता
विधान परिषद की चार सीटों पर चुनाव लड़ने वाली जदयू को केवल पटना स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जीत मिली। यहां पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार अपनी सीट बचाने में सफल रहे। वहीं, सारण शिक्षक और तिरहुत स्नातक सीट पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। चुनाव परिणामों ने जदयू नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। पार्टी के भीतर संगठन की कमजोरी, चुनाव प्रचार में सहयोग की कमी और सहयोगी दलों की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
सारण में भाजपा के बागी राहुल राज ने बिगाड़ा खेल
सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा से जुड़े रहे राहुल राज ने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा था। यह सीट NDA में जदयू के खाते में गई थी। इसके बाद भाजपा ने राहुल राज को छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया था। हालांकि, इसके बावजूद राहुल राज चुनाव जीतने में सफल रहे और जदयू उम्मीदवार आनंद पुष्कर को हार का सामना करना पड़ा।
जदयू नेताओं को संदेह है कि भाजपा के कुछ नेताओं ने पर्दे के पीछे से राहुल राज की मदद की। चुनाव जीतने के बाद राहुल राज को भाजपा का समर्थन मिलने और पार्टी में शामिल किए जाने की चर्चा ने भी जदयू की नाराजगी बढ़ाई है। जदयू नेताओं का सवाल है कि जिस उम्मीदवार को चुनाव से पहले पार्टी से निष्कासित किया गया था, उसे जीत के बाद इतनी जल्दी समर्थन क्यों दिया गया?
तिरहुत में बंशीधर ब्रजवासी की जीत से बढ़ी नाराजगी
तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में जदयू उम्मीदवार अभिषेक झा लगातार दूसरी बार निर्दलीय उम्मीदवार बंशीधर ब्रजवासी से चुनाव हार गए। जीत के बाद बंशीधर ब्रजवासी ने भाजपा को समर्थन दिया। जदयू नेताओं का आरोप है कि NDA के सहयोगी दलों ने जमीन पर अपेक्षित सहयोग नहीं किया।
जदयू नेता साकेत सिंह ने कहा कि तिरहुत स्नातक क्षेत्र में अभिषेक झा के लिए काम करने वाले नेताओं ने NDA धर्म का पालन किया, लेकिन दूसरी तरफ से वैसा सहयोग नहीं मिला। उन्होंने कहा कि पार्टी नेतृत्व को पूरा फीडबैक दे दिया गया है। ताली एक हाथ से नहीं बजती। अब 5 नवंबर की बैठक में मिले फीडबैक के आधार पर आगे की रणनीति तय होगी।
उमेश कुशवाहा ने उठाए गठबंधन की एकजुटता पर सवाल
दो महत्वपूर्ण सीटों पर हार के बाद जदयू प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा ने भी नाराजगी जाहिर की है। उन्होंने NDA की एकजुटता और गठबंधन धर्म के पालन पर सवाल उठाए हैं। वहीं, चुनाव में हार का सामना करने वाले उम्मीदवार अभिषेक झा और आनंद पुष्कर भी सोशल मीडिया के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर कर चुके हैं।
पार्टी नेतृत्व ने दोनों उम्मीदवारों को सार्वजनिक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के बजाय समीक्षा बैठक तक इंतजार करने का निर्देश दिया है।
भाजपा ने भीतरघात के आरोपों को किया खारिज
जदयू की नाराजगी के बीच भाजपा नेताओं ने गठबंधन में किसी तरह के भीतरघात से इनकार किया है। भाजपा प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल का कहना है कि हर राजनीतिक दल को चुनाव परिणामों की समीक्षा करने का अधिकार है। उन्होंने स्वीकार किया कि NDA को जितनी सफलता की उम्मीद थी, उतनी नहीं मिली। हालांकि उन्होंने किसी तरह के खेला या भीतरघात की बात को खारिज करते हुए कहा कि गठबंधन पूरी तरह एकजुट है और चुनाव पूरी ताकत के साथ लड़ा गया था।
RJD ने नीतीश कुमार को दिया साथ आने का न्योता
NDA के भीतर बढ़ती नाराजगी को विपक्षी राजद भी राजनीतिक अवसर के रूप में देख रहा है। राजद के प्रधान महासचिव रणविजय साहू ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और निशांत कुमार को सतर्क रहने की सलाह दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि जदयू के कई विधायक, सांसद और नेता भाजपा के संपर्क में हैं और भाजपा कभी भी जदयू को कमजोर करने की कोशिश कर सकती है।
रणविजय साहू ने मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए नीतीश कुमार को सामाजिक न्याय की राजनीति मजबूत करने के लिए फिर से राजद के साथ आने का न्योता दिया है।
क्या भाजपा-जदयू के बीच होगा बड़ा राजनीतिक उलटफेर?
बिहार विधानसभा में भाजपा के 88 और जदयू के 85 विधायक हैं। NDA के अन्य सहयोगियों में लोजपा (रामविलास) के 19, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के पांच और राष्ट्रीय लोक मोर्चा के चार विधायक हैं। यदि जदयू NDA से अलग होता है तो भाजपा के लिए मौजूदा सहयोगियों के दम पर 122 विधायकों का बहुमत जुटाना आसान नहीं होगा।
दूसरी तरफ जदयू के 85 विधायकों के साथ राजद के 25, कांग्रेस के छह, AIMIM के पांच, वामदलों के तीन, VIP के एक और बसपा के एक विधायक को जोड़ने पर संख्या 126 तक पहुंचती है। हालांकि यह केवल मौजूदा विधानसभा संख्या बल पर आधारित संभावित राजनीतिक गणित है। फिलहाल किसी भी दल ने नए गठबंधन की औपचारिक घोषणा नहीं की है।
5 नवंबर की बैठक में संजय झा और निशांत कुमार लेंगे फीडबैक
जदयू ने 5 नवंबर को चुनाव परिणामों की समीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। इसमें राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और निशांत कुमार पार्टी नेताओं से फीडबैक लेंगे। सभी जिला अध्यक्षों, चुनाव से जुड़े विधायकों, प्रभारियों और पराजित उम्मीदवारों से जानकारी ली जाएगी।
बैठक में उम्मीदवारों के चयन, चुनाव प्रचार, संगठन की सक्रियता, बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं की भूमिका और सहयोगी दलों से मिले समर्थन की समीक्षा हो सकती है। इसके बाद पार्टी अपनी आगे की राजनीतिक रणनीति तय करेगी।
भाजपा को कड़ा संदेश दे सकती है जदयू
2025 के विधानसभा चुनाव में NDA की जीत के बाद बिहार की सत्ता में भाजपा की स्थिति पहले से मजबूत हुई है। ऐसे समय में विधान परिषद चुनाव के नतीजों ने गठबंधन के भीतर भरोसे और तालमेल को लेकर नई बहस छेड़ दी है। जदयू की नाराजगी केवल तीन सीटों पर हार तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके लिए गठबंधन धर्म और राजनीतिक सम्मान का सवाल भी बन गई है।
हालांकि, बिहार में भाजपा-जदयू के बीच टकराव का इतिहास पुराना रहा है। दोनों दल पहले भी अलग हुए और फिर साथ आए हैं। ऐसे में केवल विधान परिषद चुनाव के नतीजों के आधार पर सत्ता परिवर्तन की संभावना जताना जल्दबाजी होगी। अब देखना होगा कि 5 नवंबर की समीक्षा बैठक के बाद जदयू क्या रुख अपनाता है और भाजपा इस नाराजगी को दूर करने के लिए क्या कदम उठाती है।

