साल था 1957। फ़िल्म “जनम जनम के फेरे” रिलीज़ हुई और यह एक म्यूज़िकल हिट साबित हुई। इस फ़िल्म का गाना “ज़रा सामने तो आओ छलिये” उस दौर में इतना लोकप्रिय हुआ कि वह साल की बिनाका गीत माला की सूची में पहले स्थान पर रहा।
लेकिन इस गीत के पीछे एक भावनात्मक कहानी छिपी थी। इसके गीतकार पंडित भरत व्यास ने इसे अपने बेटे श्याम सुंदर व्यास के वियोग में लिखा था, जो एक विवाद के बाद घर छोड़कर चला गया था। भरत व्यास ने उसे खोजने के लिए हर संभव प्रयास किया—अख़बारों में विज्ञापन दिए, धार्मिक स्थलों पर प्रार्थना की, लेकिन वह नहीं मिला।
इसी दुख के दौरान एक निर्माता ने भरत व्यास से फ़िल्म के लिए गाने लिखने का अनुरोध किया, लेकिन वे इतने व्यथित थे कि उन्होंने उसे मना कर दिया। तब उनकी पत्नी ने उन्हें समझाया कि वे अपने बेटे की याद में ही सही, गीत जरूर लिखें। इस प्रेरणा से उन्होंने “ज़रा सामने तो आओ छलिये” लिखा, जिसे मोहम्मद रफ़ी और लता मंगेशकर ने गाया। यह गाना दर्द से भरा था और लोगों के दिलों को छू गया।
हालाँकि, उनका बेटा तब भी नहीं लौटा। दो साल बाद, 1959 की फ़िल्म “रानी रूपमती” के लिए उन्होंने एक और मार्मिक गीत लिखा—“आ लौट के आजा मेरे मीत।” इस गीत में भी गहरा दर्द और पुकार थी। इस बार उनकी प्रार्थना सफल हुई और उनका बेटा घर लौट आया।
विडंबना यह थी कि जो गाने पिता के वियोग से उपजे थे, वे प्रेमियों के अमर गीत बन गए। यह पंडित भरत व्यास की लेखनी का जादू था।
राजस्थान के चुरू से आए भरत व्यास ने 1943 में पुणे और फिर मुंबई का सफर तय किया। संघर्षों के बाद उन्होंने बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई और “ऐ मालिक तेरे बंदे हम,” “ज्योत से ज्योत जलाते चलो,” “सारंगा तेरी याद में” जैसे कई अमर गीत लिखे।
आज, 5 जुलाई को उनकी पुण्यतिथि पर, हम उस महान गीतकार को याद करते हैं जिनकी रचनाएँ प्रेम, विरह और भक्ति का संगम थीं और जो आज भी हमारे दिलों में जीवित हैं।