विदेश मंत्री बोले

आसियान-भारत नेटवर्क थिंक टैंकों (एआईएनटीटी) की 6वीं गोलमेज बैठक

नई दिल्ली । विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि कोरोना महामारी से दुनिया की अर्थव्यवस्था और समाजिक जीवन पर इतना घातक असर हुआ है, वह हमारी कल्पना से परे है। यह संकट 1930 के दशक में आई बड़ी आर्थिक मंदी जैसा ही है जिसने पूरी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी के सामने अभूतपूर्व संकट पैदा किया है।

विदेश मंत्री ने कहा, “वर्तमान अनुमानों के अनुसार कुल नुकसान 58 से 88 खरब अमरीकी डालर या वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 6.5-9.7 प्रतिशत है। विश्व अर्थव्यवस्था के सिकुड़ने की भविष्यवाणी की जा रही है, निश्चित रूप से यह ग्रेट डिप्रेशन के बाद सबसे बड़ा होगा।”

विदेश मंत्री ने आसियान-भारत नेटवर्क थिंक टैंकों (एआईएनटीटी) की 6वीं गोलमेज बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि महामारी से मुकाबला करने में अंतरराष्ट्रीय संस्थायें और मंच प्रभावी तरीके से कार्रवाई नहीं कर सके। महामारी ने दुनिया को यह संदेश दिया है कि संकट के समय कैसे मिलजुलकर काम करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सबसे अधिक मूल्यवान वस्तु विश्वास है। हमने पहले से ही कई स्तरों पर राष्ट्रीय सुरक्षा को आर्थिक सुरक्षा में शामिल करने के लिए नए सिरे से परिभाषित किया है। हाल ही में इसने प्रौद्योगिकी सुरक्षा के बारे में सवाल और चिंताओं को भी जन्म दिया है। वहीं महामारी ने अब स्वास्थ्य सुरक्षा के महत्व को बढ़ा दिया है।

आर्थिक सुरक्षा को आत्मनिर्भर भारत से जुड़ते हुए एस जयशंकर ने कहा कि इसका मतलब है कि अपनी राष्ट्रीय क्षमताओं को तत्काल मजबूत करना। यह सामाजिक अस्तित्व, विशेष रूप से स्वास्थ्य के महत्वपूर्ण पहलुओं को खतरे से बाहर निकालने के महत्व को भी रेखांकित करता है। इसका अर्थ है कि घरेलू प्राथमिकता को पूरा करने वाली और रोजगार सृजन करने वाली अर्थव्यवस्था का निर्माण करना न कि केवल लाभ कमाने वाली। हम इसे आत्मानिभर भारत कहते हैं।

विदेश मंत्री ने कहा कि संकट के इस काल में भी कई अच्छे उदाहरण विश्व के सामने आए हैं जहां देशों ने दवा और संसाधनों को साझा किया है। अपने कार्यों से उन्होंने दर्शाया है कि आज अधिक उदार और न्यायसंगत विश्व दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

जयशंकर ने कहा कि आसियान वैश्विक अर्थव्यवस्था के क्रॉस-रोड में से एक है। भारत दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। हम न केवल एक-दूसरे के समीप हैं, बल्कि साथ मिलकर एशिया और दुनिया को आकार देने में मदद करते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि इस मोड़ पर एक सोच से आगे बढ़ें। भारत-प्रशांत सहित बहस के लिए वैचारिक मुद्दे हैं। इंडो-पैसिफिक महासागरों की पहल है कि हमें विस्तार की जरूरत है। जैसे-जैसे वैश्विक संबंध बदलते हैं, हमें भी जायजा लेना होगा। सुरक्षा, कनेक्टिविटी, अर्थव्यवस्था और राजनीति आपकी चर्चाओं में जगह बनाएंगे।

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