भारतीय राजनीति में खालीपन छोड़ गये प्रणबदा, याद रखेगा देश

उज्ज्वल दुनिया/ ​नई दिल्ली, 01 सितम्बर  (हि.स.)। भारत के 13वें राष्ट्रपति रहे​ भारत रत्न ​​प्रणब मुखर्जी हमारे बीच नहीं रहे। अगस्त माह के आखिरी दिन 85 वर्ष की आयु में वे हमसे विदा ले गए। 
भारत रत्न प्रणब मुखर्जी का जन्म 11 दिसम्बर 1935 को पश्चिम बंगाल के वीरभूम जिले में किरनाहर शहर के निकट स्थित मिराती गांव के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता कामदा किंकर मुखर्जी 1920 से कांग्रेस पार्टी में सक्रिय होने के साथ पश्चिम बंगाल विधान परिषद में 1952 से 64 तक सदस्य रहे। वह वीरभूम (पश्चिम बंगाल) जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रह चुके थे। उनके पिता एक सम्मानित स्वतन्त्रता सेनानी थे, जिन्होंने ब्रिटिश शासन की खिलाफत के परिणामस्वरूप 10 वर्षो से अधिक जेल की सजा भी काटी थी।

निजी जीवन और शिक्षा प्रणब मुखर्जी ने सूरी (वीरभूम) के सूरी विद्यासागर कॉलेज में शिक्षा पाई, जो उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था। कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने इतिहास और राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर के साथ साथ कानून की डिग्री हासिल की है। वे एक वकील और कॉलेज प्राध्यापक भी रह चुके हैं। उन्हें मानद डी-लिट उपाधि भी प्राप्त है। उन्होंने पहले एक कॉलेज प्राध्यापक के रूप में और बाद में एक पत्रकार के रूप में अपना कैरियर शुरू किया। वे बांग्ला प्रकाशन संस्थान देशेर डाक (मातृभूमि की पुकार) में भी काम कर चुके हैं।

प्रणब मुखर्जी बंगीय साहित्य परिषद के ट्रस्टी एवं अखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष भी रहे। कामदा किंकर मुखर्जी और राजलक्ष्मी मुखर्जी के घर जन्मे प्रणब मुखर्जी का विवाह 22 वर्ष की आयु में 13 जुलाई 1957 को शुभ्रा मुखर्जी के साथ हुआ था। उनके दो बेटे और एक बेटी यानी कुल तीन बच्चे हैं। पढ़ना, बागवानी करना और संगीत सुनना, उनके तीन व्यक्तिगत शौक भी रहे। 
राजनीतिक जीवनकरीब पांच दशक पुराना उनका संसदीय जीवन 1969 में कांग्रेस पार्टी के राज्यसभा सदस्य के रूप में (उच्च सदन) से शुरू हुआ था। वे 1975, 1981, 1993 और 1999 में फिर से राज्यसभा सदस्य चुने गये। 1973 में वे औद्योगिक विकास विभाग के केंद्रीय उप मन्त्री के रूप में मन्त्रिमंडल में शामिल हुए। सन 1982 से 1984 तक कई कैबिनेट पदों के लिए चुने जाते रहे।  सन् 1984 में भारत के वित्त मंत्री बने। सन 1984 में यूरोमनी पत्रिका के एक सर्वेक्षण में उनका विश्व के सबसे अच्छे वित्त मंत्री के रूप में मूल्यांकन किया गया। उनका कार्यकाल भारत के अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ऋण की 1.1 अरब अमेरिकी डॉलर की आखिरी किश्त नहीं अदा कर पाने के लिए उल्लेखनीय रहा।

राजीव गांधी की सलाहकार मंडली के राजनीतिक षड्यन्त्र के शिकार हुए

वित्त मंत्री के रूप में प्रणबदा के कार्यकाल के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर थे। श्रीमति इंदिरा गांधी की हत्या के बाद वे प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे उपयुक्त माने गए पर गांधी परिवार के राजीव ही प्रधानमंत्री बने। उसके बाद हुए लोकसभा चुनाव के बाद राजीव गांधी की सलाहकार मंडली के राजनीतिकषड्यन्त्र के शिकार हुए, जिसने इन्हें राजीव के मन्त्रिमंडल में शामिल नहीं होने दिया। इसी तनातनी के चलते कुछ समय के लिए उन्हें कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया। उस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक दल राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस का गठन किया, लेकिन सन 1989 में राजीव गान्धी के साथ समझौता होने के बाद उन्होंने अपने दल का कांग्रेस पार्टी में विलय कर दिया।

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