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क्या धर्म के दीपक से प्रकाश ले, दो से तीन होना चाहते हैं सुदेश?

दिल्ली दरबार तय करेगा, बेरमो से केला या कमल! 

(वरिष्ठ पत्रकार कौशलेन्द्र के फेसबुक वाल से साभार)

नियति कहें या सियासी चलन, झारखंड में चुनावी चौसर बिछते ही क्या पक्ष और क्या विपक्ष; सबके सब जात-जमात और स्थानीयता का राग अलापने लगते हैं. एतद् संबंधी खबरों पर चिंतन करता मैं बुधवार दोपहर को भाजपा प्रदेश मुख्यालय पहुँच गया.
 मंशा थी कि भाजपा संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह और प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश से मिलकर दुमका व बेरमो विधानसभा उपचुनाव और संभावित कार्यकारिणी व मोर्चा विस्तार आदि के संबंध में आधिकारिक जानकारी लेकर आपके लिये गुरुवारी बेबाक लेकर हाज़िर हो सकूँ.कोविड के कारण भाजपा प्रदेश मुख्यालय में प्रवेश प्रतिबंधित था. दूरभाष पर प्रदेश अध्यक्ष अथवा संगठन मंत्री से संपर्क साध पाता उसके पहले ही मेरी निगाह पड़ी  कुछ नेता टाईप युवाओं और अधेड़ उम्र के एक नेता जी पर. उनके वार्तालाप की गरमा-गरमी देख गाड़ी खड़ी कर उनके पास पहुंच गया.  
 

 उक्त समूह के वार्तालाप अंश पर गौर करें- ‘सब आइसोलेशन में हऊ तो कमिटी- मोर्चा के विस्तार कैसे करैथौ; मोरहाबादी बाबूलाल जी के ईहां गेलियो त दूरे से कहलकौ कि – हां-हां ठीक है बोल देंगे…ऑफिस में  त ढूके  न दे रहल हऊ.. अध्यक्ष जी आवेदन लेके रख लेलौ…..आदि- आदि”.
मैं समझ गया कि ये भाजपा के कार्यकर्ताओं की जमात है,जो सांगठनिक मोर्चे में अपनी जगह बनाने के लिये प्रदेश के आला नेताओं के दरबार में अपनी दावेदारी पुख्ता करने पहुंचे हैं. मैंने उस समूह को टोका और जिज्ञासा प्रकट कर बैठा कि मामला क्या है? 

मुझे प्रति प्रश्न में उत्तर मिला- आप कौन? दूसरे ने कहा – गड़िया  में प्रेस लिखल है. तीसरे ने कहा – कौन प्रेस से हैं? जवाब देता उससे पहले चौथे ने सवाल दाग दिया- कोन जात भाई जी? अंतिम सवाल सुनकर बरबस मुझे निम्न पंक्तियां याद आ गईं-“लड़ रहे थे सब,तो मैंने पूछ दिया कि बात क्या है; नेता जी ने पलट कर पूछा कि मेरी जात क्या है?”  खैर,मैंने कहा – कुमार कौशलेन्द्र नाम है मेरा, एक स्वतंत्र पत्रकार हूं.ओह अच्छा – समूह के नेता ने कहा -हराधन महतो नाम है मेरा. बेरमो विधानसभा क्षेत्र से आये हैं, हमलोग  का जिला बोकारो पड़ता है.मैं पूछ बैठा- महतो जी, कोरोना संक्रमण काल में रांची क्यों? फोन से भी तो बात कर सकते थे? 
 

नेताजी फट पड़े – भाजपा में अब महतो महत्वहीन हो गये हैं.. देखे थे ना – रामटहल बाबू को उम्र का हवाला देकर टिकट काट दिया. उ तो सुदेश महतो मदद कर दिया नहीं तो रांची लोकसभा सीट गेले था.महतो जी रुके नहीं. आगे उनके बोल यूं थे -2019 के लोक सभा चुनाव के परिदृश्य पर गौर  करिये पत्रकार जी -रांची लोकसभा सीट से लगातार भाजपा का  प्रतिनिधित्व कर रहे भाजपा के कद्दावर कुर्मी नेता राम टहल चौधरी का टिकट काट कर संजय सेठ को भाजपा ने मैदान में उतारा. सुदेश महतो ने मदद कर संजय सेठ को जितवाया, लेकिन विधानसभा चुनाव में सुदेश से भी भाजपा ने गठबंधन तोड़ लिया. चली गई न सरकार. 

नेता जी के आक्रोशोक्ति की ये पंक्तियाँ गौरतलब हैं – अगला लोकसभा चुनाव तक मोदीजी भी 70 पार होईये न जायेंगे, उनका टिकट कटता है कि नहीं देखते हैं?  अध्यक्ष जी को यही कहने आये थे कि महतो कुर्मी को छांट के कुर्सी का सपना मत पालियेगा. न तो संगठन में और न ही सदन में जगह दीजियेगा और खाली भोट लीजियेगा.मैंने उनकी मंशा भांप विदा लेने में ही अपनी भलाई समझी और सीधा अपने विश्वस्त भाजपा सूत्र के घर पहुंच गया. भाजपा मुख्यालय के सामने की चर्चा से उन्हें अवगत कराया तो वो मुस्करा पड़े.मुझे अटपटा लगा – मैंने कहा भाई साहब जात- जमात औऱ स्थानीयता ही झारखंड की राजनीति में मुद्दा बच गया है क्या? सूत्र ने कहा- आपको तो खबर मिल ही गई, फिर परेशान क्यों हैं? मैंने कहा- ये भी कोई खबर है – कुर्मी महतो और स्थानीयता, हद्द है . 

सूत्र ने कहा- वर्तमान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और संगठन मंत्री विधानसभा चुनाव के दौरान हुई समीकरण चूक को सुधारने का संदेश केन्द्रीय नेतृत्व को संप्रेषित कर चुके हैं. आगामी दुमका और बेरमो उपचुनाव में जीत सुनिश्चित करने की सांगठनिक तैयारी भी जारी है. इसी के तहत दुमका से लुईस मरांडी की जगह बाबूलाल मरांडी को और  बेरमो से आजसू की सहमति से उम्मीदवार चयन की रणनीति को अमलीजामा पहनाने की तैयारी है. दुमका में लुईस के खिलाफ मुखर संगठनों को साधने के लिये और नेता प्रतिपक्ष के मुद्दे पर सत्तापक्ष को करारी शिकस्त देने के लिए बाबूलाल मरांडी को चुनावी दंगल में उतारने की तैयारी हो रही है. वर्तमान भाजपा प्रदेश नेतृत्व ये मानकर चल रहा है कि बेरमो विधानसभा में निर्णायक भूमिका निभाते रहे महतो समाज को साध लिया गया तो बेरमो सीट भी एनडीए के खाते में आ जायेगी. 

सूत्र ने आगे बताया कि  आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो ने विगत् राज्यसभा चुनाव के दौरान दीपक प्रकाश के पक्ष में अपने 2 मत सुनिश्चित करने के पहले बेरमो सीट पर आजसू की दावेदारी की शर्त रख दी थी. सूत्र के मुताबिक भाजपा प्रदेश संगठन मंत्री और प्रदेश अध्यक्ष भी किसी भी सूरत में बेरमो सीट एनडीए खाते में लाने का मन बना चुके हैं. पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास का पेंच यदि दिल्ली दरबार में नहीं फीट बैठा तो बेरमो सीट से आजसू का उम्मीदवार तय है.

सूत्र से जब सत्तारूढ़ दल के कुड़़मी/ कुर्मी व अन्य जातियों के आरक्षण सूची संशोधन व स्थानीयता राग अलाप के सियासी असर के संबंध में जिज्ञासा की तो जवाब मिला –  आरक्षण सूची में कुड़़मी व अन्य जातियों के नाम समाविष्टी संशोधन का कोई सियासी लाभ सत्ता पक्ष को नहीं होने जा रहा है और स्थानीयता का 32 खतियान राग तो सत्ताधारी दल को बैकफायर कर जायेगा. स्थानीयता के 32 खतियान मसले पर जहां कांग्रेस में फूट पड़ेगी वही झामुमो को निर्देशित कर रहे टीम अरिंदम की झामुमो से शहरी मतदाताओं को जोड़ने के फार्मूले को भी पलीता लग जायेगा.

आदत से मजबूर मैं अपने सूत्र की सूचना को कसौटी पर कसने के लिये वर्षों से भाजपा बीट कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार मित्र के पास चला गया.उनके मुताबिक फिलहाल प्रदेश भाजपा संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह के सख्त दिशा निर्देश में चल रही है.  पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास द्वारा संगठन पर अपनी पकड़ बनाये रखने की सियासी दखल को कम करने के मद्देनजर सांगठनिक संरचना को न्यूनतम सीमा में रखा जा रहा है. वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष और संगठन मंत्री के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पृष्ठभूमि उनके बेहतर तालमेल का अहम कारक बनता जा रहा है. यदि ये कहा जाये कि दिल्ली दरबार की हनक से संगठन को अपने अनुसार हांकने के रघुबर दास के प्रयासों को संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह ही साकार नहीं होने दे रहे तो अतिशयोक्ति नहीं होगी. भाजपा की प्रादेशिक सियासत में रघुबर काल का अंत कहना अभी जल्दबाजी होगी लेकिन इतना स्पष्ट संकेत तो मिल ही रहा है कि सांगठनिक और गठबंधन की चूकों को सुधारने हेतु धर्मपाल सिंह कमर कस चुके हैं.
 

आजसू सुप्रीमो के संबंध में पत्रकार मित्र ने कहा- उपरी तौर पर सौम्य रणनीति अपनाने वाले सुदेश महतो हाल के वर्षों में मिले कई सियासी वादाखिलाफी के झटकों से सचेत हो चुके हैं. रामगढ़ की परंपरागत सीट खोने और चर्चा के बावजूद चन्द्रप्रकाश चौधरी को केन्द्रीय कैबिनेट में शामिल नहीं किये जाने का हिसाब सुदेश बेरमो सीट पर अपनी स्वभाविक  दावेदारी ठोक कर करेंगे यह तय मान लीजिये. गिरीडीह लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व आजसू के दूसरे कद्दावर चन्द्रप्रकाश चौधरी कर ही रहे हैं और बेरमो विधानसभा उनके संसदीय क्षेत्र का ही अंग है. बेरमो सीट पर आजसू की दावेदारी पुख्ता होने का एक और अहम कारक है बेरमो से सटी गोमिया  विधानसभा सीट, जिसका प्रतिनिधित्व आजसू के लंबोदर महतो कर रहे हैं. कुर्मी मतदाताओं की निर्णायक तादाद और अपनी सियासी ज़मीन विस्तार को आतुर सुदेश महतो को इस दफा  गठबंधन सहयोगी भाजपा से सियासी दांवपेंच की उम्मीद तो कत्तई नहीं होगी. समीकरणों की बात करें तो सार्वजनिक तौर पर आजसू को अपना नैसर्गिक सहयोगी करार दे वर्तमान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष दीपक प्रकाश  राज्यसभा चुनाव में मिले आजसू के समर्थन का मोल जरूर रखेंगे. रही बात प्रदेश संगठन मंत्री धर्मपाल सिंह की तो वे विगत चुनाव में हुई संगठनात्मक और गठबंधन चूकों को दुरूस्त करने की एकल मुहिम में जुटे हुए हैं.

बहरहाल, विगत् 20 वर्षों से जात-जमात और स्थानीयता के मुद्दे अटकी पड़ी सूबे की सियासत में विकास की  घोषणाएं सरकारी फाईलों तक ही सिमटी दिखती हैं. वर्तमान सत्ताधारी भी विकास व रोजगार समेत अन्य मुद्दों को परे रख स्थानीयता और जात- जमात की सियासत में  ही उलझते दिख रहे हैं.

‘हेमंत हैं तो हिम्मत है’ से उत्साहित जनता वही पुराने राग सुनकर जहां हतप्रभ है वहीं भाजपा नेतृत्व  सत्ता में पुनर्वापसी के समीकरण साधता दिख रहा है. तमाम सियासी घटनाक्रम के बीच इतना तो तय है कि सूबे में सियासत की धारा नहीं बदली तो झारखंड की तकदीर नहीं बदलने वाली । 

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