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मैरिटल रेप पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा सवाल, कहा- संवैधानिक फैसला आने तक पति पर कैसे चलेगा केस?

नई दिल्ली: वैवाहिक दुष्कर्म यानी मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को अहम सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने सवाल उठाया कि जब तक मैरिटल रेप एक्सेप्शन की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं हो जाता, तब तक क्या किसी पति के खिलाफ पत्नी से दुष्कर्म के आरोप में मुकदमा चलाया जा सकता है?

पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने कहा कि मौजूदा कानून को देखते हुए पहले यह तय करना जरूरी होगा कि वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़ी कानूनी छूट संवैधानिक रूप से गलत या स्पष्ट रूप से मनमानी है या नहीं। इसके बाद ही इस आधार पर मुकदमा चलाने की अनुमति का सवाल तय किया जा सकता है।

क्या है मैरिटल रेप एक्सेप्शन?

भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के अपवाद-2 के तहत यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है और पत्नी नाबालिग नहीं है, तो उसे दुष्कर्म नहीं माना जाता था। नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद IPC की धारा 375 से संबंधित प्रावधान भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 63 में हैं।

सुप्रीम कोर्ट इसी वैवाहिक दुष्कर्म अपवाद की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने और उसका समर्थन करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है।

शादी से खत्म नहीं होती महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि शादी के बाद भी महिला की व्यक्तिगत स्वायत्तता और अपनी देह के संबंध में निर्णय लेने का अधिकार समाप्त नहीं होता। वकीलों ने कहा कि यदि विवाह के भीतर पत्नी की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंध बनाए जाते हैं, तो उसके खिलाफ भी आपराधिक मुकदमा चलना चाहिए।

पीठ ने कहा कि वह इस दलील को समझती है कि विवाह से व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं होती। हालांकि, अदालत के सामने मुख्य सवाल यह है कि मौजूदा कानून ऐसे कृत्य को दुष्कर्म के रूप में मान्यता देता है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले का किया जिक्र

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाई कोर्ट के एक फैसले का भी उल्लेख किया। इस फैसले में कहा गया था कि वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़ी कानूनी छूट पूरी तरह लागू नहीं होती और पत्नी की इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने के आरोप में पति के खिलाफ IPC की धारा 376 के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी संदर्भ में सवाल किया कि जब मैरिटल रेप एक्सेप्शन की संवैधानिक वैधता अभी तय नहीं हुई है, तो क्या इस आधार पर पति के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी जा सकती है?

सॉलिसिटर जनरल ने कहा- तब तक जारी रहेगी छूट

जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल किया कि जब तक अदालत मैरिटल रेप एक्सेप्शन की संवैधानिक वैधता पर फैसला नहीं कर देती, तब तक क्या ऐसे मामलों में मुकदमा चलाने की अनुमति दी जा सकती है।

केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि अदालत के फैसले तक मौजूदा कानूनी छूट जारी रहनी चाहिए।

पीठ ने नए कानूनी सिस्टम के तहत यौन अपराधों से जुड़े प्रावधानों पर भी सवाल किए। अदालत ने पूछा कि यदि धारा 377 के तहत आने वाला कोई अपराध किसी महिला के खिलाफ किया जाता है और वह आरोपी की पत्नी भी है, तो क्या वैवाहिक संबंध के कारण वह अपराध की श्रेणी से बाहर हो जाएगा। इस पर सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मौजूदा न्यायिक स्थिति के तहत ऐसा ही परिणाम निकलता है।

‘नया अपराध नहीं बनेगा’ वाली दलील पर बहस

एक वकील ने अदालत में दलील दी कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने से कोई नया अपराध नहीं बनेगा। उनका कहना था कि रेप पहले से ही आपराधिक कानून के तहत अपराध है और केवल पति-पत्नी के रिश्ते के कारण कुछ मामलों को इससे बाहर रखा गया है।

हालांकि, जस्टिस बागची ने इस दलील से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि संविधान के प्रावधानों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता। अदालत को आपराधिक मंशा, दोषी होने की जिम्मेदारी और संवैधानिक सिद्धांतों जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना होगा।

पीठ ने यह भी कहा कि आपराधिक कानूनों की व्याख्या इस तरह होनी चाहिए कि नागरिकों को कानून के परिणाम को लेकर अप्रत्याशित स्थिति का सामना न करना पड़े।

गंभीर चोट या मौत होने पर नहीं मिलता संरक्षण

सुनवाई के दौरान पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक दुष्कर्म से जुड़ी छूट किसी आरोपी को हर स्थिति में संरक्षण नहीं देती। अदालत ने कहा कि यदि किसी मामले में गंभीर चोट पहुंचती है या मौत होती है, तो अन्य लागू आपराधिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

केंद्र ने 2024 में किया था मैरिटल रेप का विरोध

केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर वैवाहिक दुष्कर्म को अपराध घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं का विरोध किया था।

केंद्र ने कहा था कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक संबंधों के नियमन से जुड़े मामलों में संसद के कानूनी फैसले की संवैधानिक समीक्षा करते समय उचित सम्मान दिया जाना चाहिए। सरकार ने अपने हलफनामे में कहा था कि वैवाहिक दुष्कर्म को IPC की धारा 375 के अपवाद-2 के जरिए रेप की परिभाषा से बाहर रखा गया है।

शादी की संस्था को लेकर केंद्र का तर्क

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा था कि भारत के सामाजिक और कानूनी परिवेश में विवाह की प्रकृति को देखते हुए यदि विधायिका यह मानती है कि विवाह संस्था की रक्षा के लिए संबंधित छूट को बनाए रखना जरूरी है, तो सुप्रीम कोर्ट के लिए उसे रद्द करना उचित नहीं होगा।

हालांकि केंद्र ने यह भी कहा था कि सरकार महिलाओं की स्वतंत्रता, गरिमा और अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। महिलाओं के खिलाफ घरेलू हिंसा और शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक तथा आर्थिक शोषण को रोकना सरकार की प्राथमिकता है।

शादी के भीतर भी महिला की सहमति जरूरी

केंद्र ने अपने हलफनामे में माना था कि शादी से महिला की सहमति खत्म नहीं होती और उसकी इच्छा का उल्लंघन दंडनीय होना चाहिए। हालांकि सरकार का तर्क था कि विवाह के भीतर होने वाले ऐसे उल्लंघनों के कानूनी और सामाजिक परिणाम विवाह से बाहर होने वाले मामलों से अलग होते हैं।

केंद्र ने IPC की धारा 354, 354A, 354B और 498A तथा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 का हवाला देते हुए कहा था कि इन कानूनों में महिलाओं के अधिकार और सम्मान की रक्षा के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं।

सरकार ने यह भी कहा था कि विवाह के भीतर और विवाह के बाहर होने वाले कृत्यों के बीच किया गया कानूनी अंतर संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन नहीं करता।

तीन सप्ताह बाद होगी अंतिम सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में विस्तृत दलीलें सुनने के बाद निर्देश दिया कि याचिकाओं को तीन सप्ताह बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए। अदालत को बताया गया कि केंद्र सरकार इस मामले में अपना हलफनामा पहले ही दाखिल कर चुकी है।

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