नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी शिक्षक का अनुशासन बनाए रखने के दौरान गलत फैसला लेना या अनुचित शारीरिक दंड देना, अपने आप में पॉक्सो कानून के तहत यौन अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने दो नाबालिग छात्राओं को पीटने के आरोपी पश्चिम बंगाल के एक स्कूल शिक्षक के खिलाफ दर्ज POCSO केस और विशेष अदालत में लंबित पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।
शिक्षक पर छात्राओं को पीटने का था आरोप
मामला पश्चिम बंगाल के एक स्कूल का है। आरोप था कि भूगोल की कक्षा में दो नाबालिग छात्राएं सवालों का जवाब नहीं दे पाईं और अपनी मैप बुक भी नहीं लाई थीं। इसके बाद शिक्षक ने कथित तौर पर उनकी पीठ और कमर पर डंडे से पिटाई की थी।
इस मामले में जुलाई 2025 में पॉक्सो एक्ट की धारा 10 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। यह धारा गंभीर यौन उत्पीड़न से संबंधित है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने 8 सितंबर को दिए आदेश में कहा कि शिक्षक का व्यवहार भले ही उचित नहीं रहा हो, खासकर शारीरिक दंड देने और छात्राओं के प्रति संवेदनशीलता नहीं दिखाने के मामले में, लेकिन उपलब्ध बयानों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि उसने POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत यौन अपराध किया।
अदालत ने कहा कि शिक्षक को छात्राओं के साथ अधिक संवेदनशीलता से व्यवहार करना चाहिए था। हालांकि, केवल अनुशासनात्मक गलती या शारीरिक दंड को गंभीर यौन उत्पीड़न के अपराध के बराबर नहीं माना जा सकता।
मुकदमा जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी शिक्षक पर छात्राओं के साथ यौन उत्पीड़न का आरोप लगना उसके करियर और निजी जीवन पर गंभीर असर डाल सकता है। अदालत के अनुसार, यदि कोई शिक्षक मुकदमे के अंत में बरी भी हो जाता है, तब तक उसकी प्रतिष्ठा और जीवन को हुए नुकसान की पूरी भरपाई संभव नहीं होती।
पीठ ने यह भी कहा कि एफआईआर दर्ज कराने में हुई देरी और स्कूल के हेडमास्टर तथा महिला शिक्षिकाओं की भूमिका को लेकर भी संदेह की वजहें मौजूद हैं। अदालत के मुताबिक, इन लोगों के बयान काफी हद तक सुनी-सुनाई बातों पर आधारित थे।
ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आपराधिक मुकदमे को आगे जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग और आरोपी शिक्षक के साथ गंभीर अन्याय होगा।
अन्य छात्राओं के आरोपों का भी किया गया उल्लेख
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि एफआईआर, काउंसलिंग-सह-जांच रिपोर्ट और शुरुआती जानकारी से शिक्षक की नीयत पर सवाल उठते हैं। शिकायतकर्ता ने शिक्षक पर गलत तरीके से छूने का आरोप भी लगाया था। इसके अलावा तीन अन्य छात्राओं ने कहा था कि शिक्षक ने उन्हें इस तरह देखा, जिससे वे असहज महसूस करती थीं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उपलब्ध सामग्री और छात्राओं के बयानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि इन तथ्यों से POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत गंभीर यौन उत्पीड़न का अपराध प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होता।
कलकत्ता हाई कोर्ट का आदेश खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष अप्रैल में कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए विशेष POCSO कोर्ट में लंबित पूरी कार्यवाही रद्द कर दी। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चों, विशेषकर छात्राओं के साथ व्यवहार करते समय शिक्षक को संवेदनशील और जिम्मेदार होना चाहिए, लेकिन हर अनुशासनात्मक गलती को POCSO के तहत यौन अपराध नहीं माना जा सकता।

