भारतीय भाषाओं में चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा देने की दिशा में ऐतिहासिक पहल
विश्वास कैलाश सारंग
खेल एवं सहकारिता मंत्री, मध्यप्रदेश सरकार
भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह समाज की स्मृति, संस्कृति और संवेदना को सहेजने का काम भी करती है। स्टीफन स्पेंडर के शब्दों में सृजन के स्तर पर अपनी भाषा एक आध्यात्मिक गतिविधि है। टॉल्सटॉय ने भी भाषा में आध्यात्मिक सक्रियता के स्रोतों की बात कही है। मुक्तिबोध के शब्दों में ‘स्व’ से ऊपर उठकर दूसरे के मर्म में प्रवेश करना मनुष्यता का सबसे बड़ा लक्षण है। हिन्दी में यह संवेदना उसके शब्दों और अभिव्यक्ति में सहज दिखाई देती है।
हिन्दी की सबसे बड़ी विशेषताओं में उसकी उदारता और आत्मसात करने की क्षमता शामिल है। इसमें दुनिया की अनेक भाषाओं के शब्द शामिल हुए हैं और वे केवल बाहरी शब्द बनकर नहीं रहे, बल्कि हिन्दी ने उन्हें अपने स्वभाव में आत्मसात किया है। हिन्दी भारत की संस्कृति, लोकजीवन और सामाजिक चेतना से गहराई से जुड़ी भाषा है। कबीर, सूरदास, मीराबाई, विद्यापति और जायसी जैसे रचनाकारों की परंपरा ने इसे समृद्ध किया है। भक्ति आंदोलन ने समाज की अनेक खाइयों को पाटने और व्यापक मानवीय चेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज हिन्दी को केवल साहित्य और बोलचाल की भाषा तक सीमित रखने के बजाय ज्ञान, विज्ञान, चिकित्सा, तकनीक और अनुसंधान की भाषा के रूप में विकसित करना समय की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का निरंतर प्रयास रहा है कि भारत की शिक्षा व्यवस्था भारतीय भाषाओं, भारतीय ज्ञान परंपरा और भारतीय प्रतिभा की शक्ति के अनुरूप आगे बढ़े। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 ने भी शिक्षा में भारतीय भाषाओं के महत्व को नई दिशा दी है।
इसी सोच को धरातल पर उतारते हुए मध्यप्रदेश ने चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक पहल की। मुझे गर्व है कि चिकित्सा शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य करते हुए हम मध्यप्रदेश का नाम उस उपलब्धि से जोड़ने में सफल रहे, जब राज्य हिन्दी माध्यम में एमबीबीएस की पढ़ाई शुरू करने वाला देश का पहला राज्य बना। यह पहल केवल मध्यप्रदेश की उपलब्धि नहीं थी, बल्कि भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के प्रति विश्वास को मजबूत करने वाला कदम भी था।
16 अक्टूबर 2022 मध्यप्रदेश के लिए एक ऐतिहासिक दिन रहा। भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह के करकमलों से एमबीबीएस प्रथम वर्ष की हिन्दी पुस्तकों का विमोचन किया गया और हिन्दी में मेडिकल शिक्षा के नए अध्याय की शुरुआत हुई। इसका उद्देश्य अंग्रेजी के विरोध में हिन्दी को खड़ा करना नहीं था, बल्कि यह सुनिश्चित करना था कि भाषा किसी विद्यार्थी की प्रतिभा के रास्ते में बाधा न बने।
जिस भाषा में विद्यार्थी सोचता है, अपने परिवार से संवाद करता है और अपने अनुभवों को समझता है, उसी भाषा में कठिन विषयों को समझना उसके लिए सहज हो सकता है। हालांकि हिन्दी में एमबीबीएस की किताबें तैयार करना सामान्य अनुवाद का काम नहीं था। चिकित्सा विज्ञान की जटिल शब्दावली और तकनीकी अवधारणाओं को वैज्ञानिक रूप से सही और विद्यार्थियों के लिए सरल भाषा में प्रस्तुत करना बड़ी चुनौती थी।
इसी उद्देश्य से चिकित्सा शिक्षा विभाग के अंतर्गत हिन्दी में एमबीबीएस पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए अलग हिन्दी पाठ्यक्रम प्रकोष्ठ बनाया गया। विशेषज्ञों की उच्चस्तरीय टास्क फोर्स के माध्यम से कार्ययोजना तैयार की गई और चिकित्सा क्षेत्र के विशेषज्ञों की सहभागिता से पाठ्यक्रम एवं पुस्तकों को चरणबद्ध तरीके से तैयार किया गया। इस प्रक्रिया को संस्थागत स्वरूप देने के लिए हिन्दी चिकित्सा प्रकोष्ठ ‘मंदार’ का गठन किया गया।
समुद्र मंथन से अमृत प्राप्त होने की उपमा देते हुए कहा जा सकता है कि ज्ञान के मंथन, विशेषज्ञों के परिश्रम और संकल्प की साधना से ‘मंदार’ के माध्यम से चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में नया रास्ता तैयार हुआ। महीनों के अथक परिश्रम के बाद एमबीबीएस की पुस्तकों और पाठ्यक्रम को हिन्दी में उपलब्ध कराने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली।
यह पहल केवल प्रथम वर्ष तक सीमित नहीं रही। प्रथम वर्ष की पुस्तकों के विमोचन के बाद एमबीबीएस द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ वर्ष की पुस्तकों के लिप्यंतरण तथा पाठ्यक्रम संबंधी कार्य को भी आगे बढ़ाया गया। इससे स्पष्ट है कि मध्यप्रदेश की पहल किसी प्रतीकात्मक कार्यक्रम तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके पीछे चिकित्सा शिक्षा को भारतीय भाषाओं में अधिक सुलभ बनाने की दीर्घकालिक सोच थी।
मध्यप्रदेश की पहल के बाद छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने भी हिन्दी में एमबीबीएस शिक्षा की दिशा में कदम बढ़ाए। इस तरह हिन्दी में एमबीबीएस की शुरुआत भारतीय भाषाओं में चिकित्सा शिक्षा को बढ़ावा देने वाले व्यापक प्रयास की शुरुआत बनी।
हिन्दी में एमबीबीएस की शुरुआत मेरे सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। यह उस संकल्प की जीत है जिसमें गांव, गरीब और सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाला विद्यार्थी भी डॉक्टर बनने का सपना पूरे आत्मविश्वास के साथ देख सके।
राष्ट्रीय हिन्दी दिवस के अवसर पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को केवल बोलचाल तक सीमित नहीं रखा जाएगा। इन्हें ज्ञान, विज्ञान, अनुसंधान, चिकित्सा, तकनीक और नवाचार की भाषाओं के रूप में भी निरंतर सशक्त बनाया जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन पंक्तियों में भी आगे बढ़ने का यही संकल्प दिखाई देता है—“आसमान में सिर उठाकर, घने बादलों को चीरकर, रोशनी का संकल्प लें, अभी तो सूरज उगा है।” हिन्दी भी इसी विश्वास और ऊर्जा के साथ निरंतर आगे बढ़ रही है।
कबीर की पंक्तियां हैं—“पिंजर प्रेम प्रकासिया, अंतरि भया उजास। मुखि कस्तूरी महमही, बाणी फूटी बास।” जब भीतर प्रेम और प्रकाश जागता है, तो उसकी सुगंध वाणी में भी उतरती है। हिन्दी भी इसी संवेदना, विचार और आत्मविश्वास की भाषा है। यह हमारी भाषा है, हमारी स्मृति है और हमारे सामूहिक भविष्य की संभावनाओं की भाषा भी है।

