जानिए कौन थे रामानुजाचार्य, उनकी मूर्ति “समता की प्रतिमा” क्यों है ?

 

त्रिपुण्ड ही है रामानुजाचार्य के भक्तों का प्रतीक
त्रिपुण्ड ही है रामानुजाचार्य के वैष्णव पंथ के भक्तों का प्रतीक

हर किसी की पीड़ा को कम करने के लिए भले ही मुझे अकेले नरक में जाना पड़े, मैं खुशी से ऐसा करूंगा. भगवान के सामने सभी समान हैं. हर जाति को उनका नाम लेने का अधिकार है. मंदिर में प्रवेश सभी के लिए खुला है.” रामानुजाचार्य ने अलग-अलग मौकों पर ये संदेश दिए हैं.

रामानुजाचार्य हिंदू भक्ति परंपरा से आते हैं. वह एक विचारक थे. उनका जन्म 1017 ईसवी में हुआ था और वो 1137 ईसवी तक जीवित रहे थे. तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदुर में एक ब्राह्मण परिवार में उनका जन्म हुआ था. वो वरदराज स्वामी के भक्त थे. श्रीरंगम उनकी कर्मभूमि रही. उनकी समाधी अभी भी श्रीरंगम में श्री रंगनाथ स्वामी मंदिर में है.

उन्होंने विशिष्टाद्वैत सिद्धांत दिया था. इस सिद्धांत के अनुयायी श्री वैष्णव के नाम से जाने जाते हैं. उनके माथे पर दो सीधी लकीरों वाला टीका लगा होता है और वो अपने कंधे पर हमेशा शंख चक्र प्रतीक रखते हैं. इस संप्रदाय के जो लोग संन्यास लेते हैं उन्हें जीयर कहा जाता है. उनके कई नाम होते हैं जैसे इलाया पेरूमल, एमबेरूमनार, यथीराज भाष्यकरा आदि.

श्री रामानुजाचार्य शंकराचार्य के अद्वैत विचार से पूरी तरह असहमति रखते थे. श्री वैष्णव के शब्दों में, ”अद्वैत विचार में ये नियम है कि अष्ठाक्षरी मंत्र किसी को नहीं बताया जाता लेकिन रामानुजम ने इससे असहमति जताते हुए गोपुरम मंदिर से मंत्र का उच्चारण किया था ताकि सब उसे सुन सकें. उन्होंने स्वेच्छा से उस नियम का उल्लंघन किया कि जो भी मंत्र को सुनता है उस पर कृपा होती है और जो दूसरों के लिए मंत्र बोलता है उससे शाप लगता है.

उनका कहना था कि अगर सभी पर कृपा होती है तो वो शाप लेने के लिए तैयार हैं. उन्होंने कुछ मंदिरों में दलितों के प्रवेश को लेकर काम किया. उन्होंने लोगों को निचली जातियों से वैष्णव में बदला. उन्होंने इन जातियों से कुछ पुजारी भी बनाए.”

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