आज 06 दिसम्बर है, 06 दिसम्बर 1992 याद है ?

6 दिसंबर,1992की याद:

“छह दिसंबर की सुबह से ही या यों कहिए कि रात से ही विवादित परिसर के आस-पास सिर्फ़ कारसेवक और पुलिस वाले ही दिख रहे थे.

सुबह होते ही उत्साह से लबरेज कारसेवक सारी बैरीकेडिंग तोड़ते हुए अंदर पहुंच गए. जो जिधर से जगह पाया उधर से ही ढांचे के ऊपर चढ़ गया.

किसी के हाथ में कुछ था नहीं लेकिन उत्साह इतना प्रबल था कि ईंट-पत्थर जो मिला उसी से ढांचा तोड़ना शुरू कर दिया और देखते ही देखते सैकड़ों की संख्या में कारसेवक ढांचे के ऊपर चढ़ गए और कुछ घंटों के भीतर मस्जिद ध्वस्त कर दी गई.

अयोध्या में 6 दिसंबर 1992 की घटना को बयान करते हुए एक उस विध्वंसक घटना में शामिल एक कारसेवक बताते हैं।

वो बताते हैं, “चार दिन पहले महंत नृत्यगोपाल दास जी के यहां से एक आदेश आया था कि सरयू नदी की रेत लाकर हम लोग यहां प्रतीकात्मक कार सेवा करेंगे,यानि उस बालू को रख देंगे जो बाद में मंदिर बनाते समय ईंट जुड़ाई के काम आएगा.

लेकिन इस बात को लेकर कारसेवकों में बेहद नाराज़गी थी.कई कारसेवक मंत्रियों, नेताओं और यहां तक साधु संतों तक को गाली देने लगे कि हम लोगों को हर बार बुलाकर यही सब नौटंकी कराई जाती है. सच बताएं तो कारसेवक तय कर चुके थे कि इस बार उन्हें इन लोगों की बात नहीं माननी है.”

दरअसल,लोगों की कल्पना से भी ज़्यादा कारसेवक अयोध्या में पहुंच चुके थे और मंच पर मौजूद नेताओं को ये आभास हो चुका था कि यदि अब उन्हें वापस लौटने को कहा गया या फिर उनकी इच्छा के विपरीत कोई फ़रमान दिया गया तो कारसेवक भड़क जाएंगे और फिर कुछ भी कर सकते हैं.

उस समय सिर्फ़ साध्वी ऋतंभरा ने मंच से एक बात कही थी-‘जो कहा जाता है,वो किया नहीं जाता और जो किया जाता है, वो कहा नहीं जाता’.
मंच पर भाषण ख़त्म होने के बाद कारसेवकों का हुजूम जन्मभूमि परिसर की ओर बढ़ गया और फिर उन्होंने वो शुरू कर दिया, जो वो तय करके आए थे. वो बताते हैं कि ढांचे की ऊंचाई बहुत ज़्यादा थी नहीं और कारसेवकों का उत्साह चरम पर था,इसलिए कुछ पता ही नहीं चला कि कब हज़ारों कारसेवक ढांचे के ऊपर चढ़कर उसे तोड़ना शुरू कर दिए.

वो कहते हैं कि एक साधु तो पीएसी की बड़ी सी बस को ही अचानक स्टार्ट करके परिसर की ओर दौड़ा दिया, “बैरीकेडिंग तोड़ते हुए वो परिसर के अंदर दाख़िल हुआ और जितना कुछ नुक़सान कर सकता था किया. बाद में कारसेवकों ने ही उसे क़ाबू किया.”

मुश्किल से तीन-चार घंटों के भीतर ढांचा गिरा दिया गया और शाम को तीन-चार बजे तक तो वहां मलबा तक नहीं दिख रहा था. वो बताते हैं, “गुंबद के ऊपर रस्सी फेंककर पहले तो लोग चढ़ गए और फिर रस्सी को गुंबद से बांधकर दोनों ओर से हज़ारों लोग खींचने लगे.वहीं नीचे खड़े लोग पूरी ताक़त से धक्का दे रहे थे और तोड-फोड़ कर रहे थे.कोई खिड़की तोड़ रहा था, कोई दरवाज़ा तोड़ रहा था. देखते ही देखते ढांचे का नामोनिशान मिट गया.
ढांचा गिरने के बाद तमाम लोग उन ईंटों को अपने साथ लेकर चले गए ताकि इस बात का प्रमाण रहे कि वो यहां आए थे।

6दिसंबर,1992 की दोपहर कल्याण सिंह अपने निवास स्थान 5,कालिदास मार्ग पर अपने दो मंत्रिमंडलीय सहयोगियों लालजी टंडन और ओमप्रकाश सिंह के साथ एक टेलिविजन के सामने बैठे हुए थे.

मुख्यमंत्री के कमरे के बाहर उनके प्रधान सचिव योगेंद्र नारायण भी मौजूद थे.वहाँ मौजूद सबलोगों को भोजन परोसा जा रहा था.अचानक सबने देखा कि कई कारसेवक बाबरी मस्जिद के गुंबद पर चढ़ गए और कुदालों से उसे तोड़ने लगे.

हांलाकि वहाँ पर्याप्त संख्या में अर्ध सैनिक बल तैनात थे,लेकिन कारसेवकों ने उनके और बाबरी मस्जिद के बीच एक घेरा सा बना दिया था, ताकि वो वहाँ तक पहुंच न पाएं.

उसी समय उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक एस एम त्रिपाठी भागते हुए आए और उन्होंने मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से तुरंत मिलने की अनुमति मांगी.जब अंदर संदेश भिजवाया गया तो मुख्यमंत्री ने उन्हें भोजन समाप्त होने तक इंतज़ार करने को कहा.

थोड़ी देर बाद जब त्रिपाठी अंदर गए तो उन्होंने उन्हें देखते ही कारसेवकों पर गोली चलाने की अनुमति मांगी,ताकि बाबरी मस्जिद को गिरने से बचाया जा सके.कल्याण सिंहने उनसे पूछा कि अगर गोली चलाई जाती है तो क्या बहुत से कारसेवक मारे जाएंगे?
त्रिपाठी ने जवाब दिया-जी हाँ!

कल्याण सिंह ने तब उनसे कहा-मैं आपको गोली चलाने की अनुमति नहीं दूंगा.आप दूसरे माध्यमों जैसे लाठीचार्ज या आँसू गैस से हालात पर नियंत्रण करने की कोशिश करिए.

डीजीपी ये सुन कर वापस अपने दफ़्तर लौट गए. जैसे ही बाबरी मस्जिद की आखिरी ईंट गिरी,कल्याण सिंह ने अपना राइटिंग पैड मंगवाया और अपने हाथों से अपना त्यागपत्र लिखा और उसे ले कर खुद राज्यपाल के यहाँ पहुंच गए.
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कल्याण सिंह ने कहा था-मैंने सुरक्षा के सारे इंतजामात किए थे, लेकिन कारसेवकों पर गोली नहीं चलाने का आदेश भी मैंने ही दिया था.राम मंदिर को हम किसी जाति का,मजहब का,राजनीति का और वोट बैंक का प्रश्न नहीं मानते.यह राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न है.राम मंदिर के लिए एक क्या,अगर 10 बार सरकारें कुर्बान करनी पड़ेंगी तो हम तैयार हैं।
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