होली के बाद करवट लेगी झारखंड की राजनीति, कांग्रेस-भाजपा के प्रभारी झारखंड में

झारखंड भाजपा के प्रभारी दिलीप सैकिया रांची पहुंचे
झारखंड भाजपा के प्रभारी दिलीप सैकिया रांची पहुंचे

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद झारखंड की राजनीति करवट बदल सकती है। कांग्रेस हो या झामुमो, अंदर ही अंदर हलचल तेज है। झारखंड कांग्रेस के प्रभारी लगातार डेरा डाले हुए हैं, तो भाजपा के प्रभारी दिलीप सैकिया भी रांची पहुंच चुके हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि होली के बाद कुछ बड़ा होगा और इसी बड़ा होने के डर से सत्तारूढ़ गठबंधन ने 12वें मंत्रीपद और बोर्ड-निगम के गठन को होल्ड पर रखा है।

कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे ने की हेमंत सोरेन से मुलाकात

देर शाम मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिले कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे
देर शाम मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिले कांग्रेस प्रभारी अविनाश पांडे

सोमवार देर शाम झारखंड कांग्रेस के प्रभारी अविनाश पांडे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मिलने पहुंचे। अविनाश पांडे के साथ आलमगीर आलम और प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर भी मौजूद थे। दोनों नेताओं ने इसे शिष्टाचार मुलाकात बताया। लेकिन इस मुलाकात के दौरान झामुमो-कांग्रेस के बीच कॉर्डिनेशन कमेटी बनाने और राज्य के ताजा राजनीतिक हालात पर भी चर्चा हुई । भाषा विवाद, स्थानीय नीति, ओबीसी आंदोलन को लेकर जिस तरह झामुमो और कांग्रेस के रूख अलग-अलग हैं । कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों की माने तो अविनाश पांडे सीएम हेमंत सोरेन के सामने इस बात को रख आए हैं कि विवादित मुद्दों पर दोनों पार्टियों के बीच संवादहीनता की स्थिति न आए, इसके लिए कॉर्डिनेशन कमेटी बेहद जरूरी है।

कांग्रेस कोटे के मंत्री बदलने की चर्चा

कांग्रेस के अंदर इस बात की जबरदस्त चर्चा है कि कांग्रेस कोटे के कम से कम एक मंत्री बदले जा सकते हैं। राजधानी रांची के ललगुटवा बैंक्वेट हॉल में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान भी प्रभारी अविनाश पांडे के सामने कई कार्यकर्ताओं ने मंत्रियों द्वारा दरकिनार किए जाने का सवाल उठाया। बंधु तिर्की ने तो यहां तक कह दिया कि भाजपा की ओर से मुझे गृहमंत्री का ऑफर था। हालांकि, बाद में वे संभल गए, लेकिन तबतक बंधु तिर्की की बात कैमरे में रिकॉर्ड हो चुकी थी।

विधानसभा चुनावों के बाद बदलेगा देश का सियासी माहौल

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने हाल ही में हेमंत सोरेन से मुलाकात की थी। केसीआर देश में घूम-घूम कर गैर-कांग्रेसी तीसरे मोर्चे की बात करते रहे हैं। विधानसभा चुनावों में अगर कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा तो गैर-कांग्रेसी तीसरे मोर्चे का शोर और जोर से उठेगा। पड़ोंस के राज्यों जैसे बंगाल में ममता बनर्जी के बाद बिहार में तेजस्वी यादव भी अब गैर-कांग्रेसी विकल्प बनाने की बात कह चुके हैं। क्या हेमंत सोरेन पड़ोसी राज्यों सहित देश भर में चल रही चर्चाओं से अछूते रह सकेंगे। अगर हां, तो आखिर कबतक ?

1932 आधारित स्थानीय नीति का शोर

झारखंड में भाषा विवाद के बाद अब 1932 आधारित स्थानीय नीति का शोर गूंजने लगा है। अमित मंडल और गीताश्री उरांव ने इसी मुद्दे पर क्रमशः झामुमो और कांग्रेस से नाता तोड़ लिया है। झामुमो विधायक लॉबिन हेम्ब्रम भी 1932 खतियान के समर्थकों को एक मंच पर आने की बात कर चुके हैं। आने वाले वक्त में ये मुद्दा और जोर पकड़ेगा। जैसे-जैसे झामुमो 1932 के खतियान की बात करेगी, कांग्रेस के गौर-आदिवासी नेताओं के सामने दुविधा की स्थिति पैदा होगा। कांग्रेस-झामुमो के बीच दूरी और बढ़ने की संभावना है।

हेमंत सरकार के तीन साल, पर स्थिति विकराल

हेमंत सरकार ढाई साल पूरा कर चुकी है। आदिवासियों का झामुमो से मोहभंग न हो, इसके लिए हेमंत सरकार स्थानीयता को लेकर कुछ बड़ी घोषणाएं कर सकती है। कांग्रेस भी चाहती है कि हेमंत सरकार ओबीसी आरक्षण को लेकर अपना स्टैंड क्लियर करे। लेकिन इन भावनात्मक मुद्दों को छूने का मतलब है कि दूसरा पक्ष नाराज होगा। इसके अलावा बेरोजगारी और कानून-व्यवस्था की स्थिति पर भी विपक्ष इस सरकार को चारो ओर से घेर रही है।

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