साहिबगंज जिला मे फैली राजमहल पहाड़ी श्रृंखलाओं को बचाने के लिए आदिम जनजाति सड़कों पर

पहाड़ियों को संरक्षित के लिए हेवी ब्लास्टिंग व क्रेशर संचालन पर प्रतिबंध
पहाड़ियों को संरक्षित के लिए हेवी ब्लास्टिंग व क्रेशर संचालन पर प्रतिबंध

आदिम जनजाति को उनका हक अधिकार से वंचित न करें

नीरज कुमार जैन/ब्यूरों

साहिबगंज मे फैली राजमहल पहाड़ी श्रृंखलाओं के लगातार हो रहे दोहन के बाद वैश्विक महामारी के दरम्यान जिस तरह से पहाड़ियों को विस्फोटक किया जा रहा है उससें ऐसा प्रतीत हो रहा है आने वाले कुछ समयों मे ही साहिबगंज जिला मे फैली राजमहल पहाड़ी श्रृंखलाएं इतिहास के पन्नों मे सिमट जाऐगी। भविष्य की चिंता जताते व उजड़ती विलुप्त होती पहाड़ियां जनजाति सड़क पर उतर आयी है। इसी कड़ी मे ही हिल एसेंबली पहाड़िया महासभा ने सोमवार को जिला मुख्यालय मे प्रदर्शन किया। जिला के विभिन्न प्रखंड के पहाड़ियों पर वास करने वाली आदिम जनजाति के लोग हटिया मे एकत्रित हो रैली के रूप मे पश्चिमी, पूर्वी फाटक, रेलवे स्टेशन, ग्रीन होटल, कालेज रोड, पुलिस लाइन होते हुए समहरणालय पहुंच रैली नुक्कड़ सभा मे तब्दील हो गई।

पहाड़ी श्रृंखलाओं को विस्फोट के माध्यम से दोहन से पहाड़ियां विलुप्त हो रही है फलतः आदिम जनजाति का आश्रय समाप्त होने से लेकर अन्य मांगों पर विचार व्यक्त कर डीसी रामनिवास यादव के माध्यम से मुख्यमंत्री और राज्यपाल के नाम का मांग पत्र सौंपा। आदिम जनजाति के लोग अपने परिवार व पारंपरिक हथियारों के साथ सड़क पर उतर प्रदर्शन किया। फलतः मुख्य सड़कों पर ट्रेफिक समस्या उत्पन्न हुई जिसे प्रशासन ने काफी मशक्कत के बाद पथों पर आवागमण सामान्य कर पायी।

रैली का नेतृत्व कर रहे शिवचरण मालतो ने बताया कि आदिम जनजाति संथालपरगना में ईसा पूर्व 302 से निवास करते आ रहे हैं। देश की रक्षा के लिए समय-समय पर पहाड़िया समाज ने कुर्बानियां दी है लेकिन आजादी के बाद से आदिम जनजाति लगातार अपेक्षा का दंश झेलती रही है। आदिम जनजाति पहाड़िया को मौलिक अधिकार और संवैधानिक अधिकारों से बेदखल किया जाता रहा है। पहाड़ी श्रृंखलाओं को हैवी ब्लास्टिंग व स्वचालित मशीनों से पत्थर खनन व क्रशर संचालन से कई पहाड़ियां विलुप्त हो गई है तो कई विलुप्ता के कगार पर है।

पहाडियों पर बसे आदिम जनजाति भी विलुप्त हो रहे है और जो बचे है उनके जीवन पर संकट के बादल मंडरा रहे है। फलतः पहाड़ी श्रृंखलाओं का दोहन अविलंब बंद हो। दोहन नहीं रूका तो इसे आदिम जनजाति, पहाड़िया और आदिवासी मूलवासियों को भूमि से बेदखल करने का षडयंत्र माना जाएगा। क्योंकि माइनिंग लीज जिला प्रशासन द्वारा निर्गत किया जाता है। पेसा कानून 1996 को लागू करने, 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति व नियोजन नीति बनाने की मांग के साथ मालतो एवं मवड़ो भाषा को राजभाषा में शामिल करने, झारखंड आदिम जनजाति आयोग का गठन करने, झारखंड आदिम जनजातियों को उप जाति दर्शाते हुए आदिम जनजाति का जाति प्रमाणपत्र निर्गत करने, झारखंड आदिम जनजाति प्राधिकरण का गठन करने, विशिष्ट पदाधिकारी, पहाड़िया कल्याण कार्यालय साहिबगंज, पाकुड़, दुमका में विशिष्ट पदाधिकारी एवं क्षेत्रीय पर्यवेक्षक की बहाली करने की मांग की गई।

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