लोक आस्था का महापर्व छठ सामाजिक समरसता का भी त्यौहार है

छठ पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होकर सप्तमी तिथि तक होती है। राष्ट्रीय सनातन एकता मंच एवं पवित्रम गो सेवा परिवार के प्रांतीय प्रवक्ता संजय सर्राफ ने बताया कि लोक आस्था का महापर्व छठ सामाजिक समरसता का त्यौहार भी है। छठ केवल सामाजिक समरसता का ही संदेश नहीं देता है बल्कि समाज के द्वारा समाज पर नियंत्रण का भी संदेश देता है । इस पर्व में ना तो केवल डूबने और उगते हुए सूर्य की पूजा होती है बल्कि संदेश स्पष्ट है कि उदय के बाद अस्त और अस्त के बाद उदय जिंदगी का सार्वभौम्य सत्य है।

जल में खड़ा होकर अर्घ्य देने का संदेश यह है कि जल सभ्यता की जननी है । महापर्व बेटी- बचाओ आंदोलन की वकालत करने के साथ प्रकृति की महत्त्व भी बताता है। महापर्व छठ सामाजिक समरसता का त्यौहार भी है इसका भौगोलिक दायरा अब बिहार और उत्तर प्रदेश से विस्तृत होता हुआ देश के जम्मू कश्मीर से कन्याकुमारी तक बल्कि सात समुंदर पार विदेशों तक जा पहुंचा है इसकी मुख्य वजह इस पर्व में निहित उद्देश्य और भावना है लोक आस्था का यह पर्व प्रकृति की पूजा और शुद्धता एवं पवित्रता के संगम के साथ सामाजिक सद्भाव और संयम इस महापर्व में निहित है।

सूर्योपासना का छठ पूजा का महापर्व भगवान सूर्य उनकी पत्नी उषा और प्रत्यूषा, प्रकृति, जल, वायु और भगवान सूर्य की बहन छठी मैया को विशेष रूप में समर्पित है। प्राचीन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार छठी माता को भगवान सूर्य की बहन माना जाता है। छठ यानी भगवान सूर्य की पूजा संभवत महाभारत काल में प्रारंभ हुई थी ऐसा कहा जाता है कि एक बार नारद मुनि की शिकायत पर भगवान कृष्ण अपने पुत्र शाम्ब पर क्रोधित हो गए और श्राप दे दिया जिससे शाम्ब कुष्ठ रोग के शिकार हो गए इस कुष्ठ रोग से निजात पाने के लिए शाम्ब ने छठ व्रत किया था आम लोगों को धारणा में छठ व्रत करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति भी होती है।

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