भाषा आंदोलन को धार देने के लिए गीताश्री उरावं और सूर्य सिंह बेसरा ने मिलाया हाथ

राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन
राज्यपाल के माध्यम से राष्ट्रपति के नाम सौंपा ज्ञापन

रांची । पूर्व शिक्षा मंत्री गीताश्री उरांव ने भाषाई विवाद को लेकर झारखंड समन्वय समिति का गठन किया है । सूर्य सिंह बेसरा समिति के अध्यक्ष रहेंगे और गीताश्री उरांव इस समिति की संरक्षक रहेंगी। गीताश्री उरांव ने कहा कि झारखंड में बिहार की मगही, अंगिका, भोजपुरी जैसी बोली को क्षेत्रीय भाषा का दर्जा दिया गया, वह कहीं से भी उचित नहीं था । वहीं उन्होंने कहा कि झारखंड में रहने वाले असली झारखंडियों को 1932 के खतियान के आधार पर हक अधिकार मिले । राज्य की पहचान के लिए वे संघर्ष जारी रखेंगी और इन्हीं सब मुद्दे को लेकर इस समिति का गठन किया गया है । ऐसे मैं संगठन को मजबूत करने के लिए झारखंड के सभी जिलों में जन सभाएं की जाएंगी और झारखंड समन्वय समिति को मजबूत करने के लिए सदस्यता अभियान भी चलाया जाएगा।

गीताश्री उरांव ने कहा कि आजादी के बाद संविधान निर्माण की प्रक्रिया में अनुच्छेद 244 (1) के अंतर्गत प्रावधान पांचवी अनुसूची में आदिवासियों के लिए अलग संवैधानिक प्रावधान लाया गया । जिसमें परंपरागत कानून (कस्टमरी लॉ) को मान्यता दिया गया है । पांचवी अनुसूची दर्जा प्राप्त झारखंड राज्य का इतिहास और प्राचीन परंपरागत कानून सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्थाओं को समझते हुए अंग्रेजी हुकूमत ने गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1918 और 1935 की धारा 91 और 92 के तहत ब्रिटिश सरकार स्वयं अपने हाथ में वर्जित क्षेत्र को रखा. और आदिवासियों को अपने मुताबिक रहने, जीने, रोजगार करने, शासन और (संघीय) गवर्नमेंट और प्रोविंशियल गवर्नमेंट (प्रांतीय)का किसी प्रकार का शासन और नियंत्रण का अधिकार नहीं था । जिसके तहत गवर्नर जनरल के निर्देशन में अलग से कानून बनाने और लागू करने का अधिकार दिया गया ।

राज्यपाल को सौंपा ज्ञापन

गीताश्री उरांव के नेतृत्व में अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद के शिष्टमंडल ने राज्यपाल रमेश बैस के माध्यम से भारत के राष्ट्रपति महोदय को संबोधित ज्ञापन पत्र समर्पित किया । ज्ञापन के माध्यम से अनुसूचित क्षेत्रों में आदिकाल से वास करने वाले आदिवासियों की प्राचीन परंपरागत रूढ़िवादी सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक एवं पारंपरिक व्यवस्थाओं को अक्षुण्ण बनाए रखते हुए एवं उनकी जमीन पर गैर आदिवासियों के द्वारा अवैध कब्जा एवं विस्थापन मुक्त कर संविधान में प्रदत्त विशेषाधिकार के तौर पर अनुच्छेद 244 (1) एवं संविधान के प्रावधान 5वीं अनुसूची के तहत कानून को व्यवस्थित कर लागू करने हेतु आग्रह किया गया है ।

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