कनहर सिंचाई परियोजना की मांग को लेकर अनशन पर बैठे पूर्व विधायक हेमेन्द्र प्रताप देहाती

सरकारी धोखे का शिकार हुआ कनहर सिंचाई परियोजना
सरकारी धोखे का शिकार हुआ कनहर सिंचाई परियोजना

रांची। झारखंड सरकार के पूर्व मंत्री हेमेन्द्र प्रताप देहाती अपनी मांगों को लेकर नेपाल हाउस सचिवालय में अनशन पर बैठ गए हैं। पलामू की कनहर सिंचाई परियोजना के लिए वह अनशन पर बैठे हैं। उनकी उम्र इस समय 90 वर्ष है। हेमेन्द्र प्रताप देहाती भवनाथपुर के भाजपा विधायक भानु प्रताप शाही के पिता हैं।

बेटे भानु प्रताप शाही पर क्या कहा ?

हेमेन्द्र प्रताप देहाती ने कहा कि युवावस्था से ही सिंचाई परियोजना के लिए लड़ रहा हूं। झारखंड की सरकारें अब इसके प्रति गंभीर नहीं नजर आ रही हैं। उनके पास अनशन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था, इसलिए वह अपनी मांग को पूरा कराने के लिए अनशन पर बैठ गए हैं। पूर्व मंत्री ने अपने विधायक पुत्र के बारे में कहा कि बाबू भी राजनीति करने लगे हैं। कनहर सिंचाई परियोजना से पलामू की जनता का भाग्य बदल सकता है। खेतों की प्यास बुझ सकती है। खेतों को पानी मिलेगा तो खेती शुरू होगी। घरों में संपन्नता आएगी। किसान इस सिंचाई परियोजना की लंगे समय से प्रतीक्षा कर रहे हैं। सरकारों ने इस मांग पर ध्यान नहीं दिया। किसानों में इसको लेकर काफी आक्रोश है।

1969 में अनशन के बाद शुरु हुआ था काम

हेमेन्द्र प्रताप देहाती 1969 में पहली बार बिहार विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए थे। 30 जून 1969 को बिहार विधानसभा में अनशन के बाद आरंभ कनहर सिंचाई परियोजना का काम हुआ था। तब बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर हुआ करते थे। उस वक्त 1980 तक परियोजना पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था, लेकिन अभी तक इसका कार्य पूरा नहीं हुआ है। झारखंड अलग राज्य बनने के बाद हाई पावर कमेटी बनी, लेकिन आज तक इस कमेटी की बैठक नहीं हुई।

सरकार ने किसानों के साथ छल किया

हेमेन्द्र प्रताप देहाती ने कहा कि झारखंड सरकार ने जनता के साथ इस मांग को लेकर छल किया है। उन्हें बहुत दुख है कि उम्र बीत गई लेकिन सरकारों ने काम शुरू होने के बावजूद परियोजना को पूर्ण कराने में कोई रुचि नहीं दिखाई। अगल झारखंड गठन के बाद झारखंड के विकास की उम्मीद जगी थी। महसूस हुआ था कि यह परियोजना भी अब पूरी हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। साल दर साल बीतते जा रहे हैं, सरकारें आती जाती रहीं, लेकिन किसी ने जनता की इस समस्या को दूर करने की पहल नहीं की। अब आंदोलन के सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं बचा है।

 

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