मंजूनाथ भजंत्री भी सुनील वर्णवाल वाली गलती कर बैठे

ब्यूरोक्रेसी की अपनी मर्यादा है। एक नौकरशाह या सरकारी व्यक्ति व्यक्तिगत जीवन में चाहे जिस विचारधारा को मानता हो, लेकिन सरकारी पद पर रहते हुए अपने कर्तव्यों के निर्वहन में उसे ये सार्वजनिक नहीं करना चाहिए । लेकिन झारखंड में मर्यादा में न रहना ही शायद असली प्रोटोकॉल है । कुछ अधिकारी तो इतनी निर्लज्जता से अपने राजनीतिक आका की जी हुजूरी करने लगते हैं कि कार्यकर्ता और उनके बीच फर्क ही समाप्त हो जाता है।

देवघर डीसी मंजूनाथ भजंत्री
देवघर डीसी मंजूनाथ भजंत्री

रघुवर दास के मुख्यमंत्री रहते सुनील वर्णवाल IAS कम और तत्कालीन मुख्यमंत्री के भक्त ज्यादा नजर आते थे । सुनील वर्णवाल और अनुराग गुप्ता ने अपने पद के कद का ख्याल नहीं रखा। सामान्य शिष्टाचार तो छोड़िए, सुनील वर्णवाल तो अपने समकक्ष IAS अफसरों को भी तू-तड़ाक से बात करते थे । अनुराग गुप्ता जैसे अफसर को रघुवर दास के इशारे पर राज्यसभा चुनाव के लिए लॉबिंग करने की क्या जरुरत थी,  वो समझ से परे है । शायद तत्कालीन मुख्यमंत्री के समक्ष अपना स्कोर बढ़ाने और उसके बाद ज्यादा से ज्यादा दो नंबर के पैसे बटोरने के लिए ये सब किया जाता था ।

वर्तमान सरकार में भी यही हो रहा है।  देवघर डीसी मंजूनाथ भजंत्री ने पूरी निर्लज्जता के साथ ,बिना सामान्य प्रोटोकॉल का पालन किए हेमंत सोरेन की सेवा की है। उन्होंने खुद को इतना एक्सपोज कर दिया है कि अब उनके लिए झामुमो चुनाव आयोग से टकराने के लिए तैयार है । इसी तरह कुछ और IAS अफसर हैं जो सामान्य बातचीत के दौरान भी अपनी राजनीतिक पसंद या नापसंद खुल कर जाहिर करते हैं,  वहां भी जहां इसकी कोई जरुरत नहीं है।

सुनील वर्णवाल और मंजूनाथ भजंत्री जैसे कई अफसर हैं जिन्होंने अपनी मर्यादा लांघ दी
सुनील वर्णवाल और मंजूनाथ भजंत्री जैसे कई अफसर हैं जिन्होंने अपनी मर्यादा लांघ दी

यहां नाम लेना उचित नहीं होगा लेकिन किसी को अपने आदिवासी होने पर गर्व है तो किसी को अपने एक खास जाति का । कोई अल्पसंख्यक होने के कारण इस सरकार में अपने लिए खास सहूलियतें तलाश रहा है, तो कोई बनिया बिरादरी से होने के कारण पिछली सरकार को याद कर ठंडी आहे भर रहा है । और ये सब कोई दबे-छुपे या पर्दा में रहकर नहीं हो रहा, बल्कि खुलेआम, बिल्कुल गर्व के साथ ।

जिस तरह जिलों के मालिक खुलेआम बेइज्जत हो रहे हैं,  जिस तरह पैसे लेकर ट्रांसफर पोस्टिंग हो रही है, उससे तो लगता है कि आने वाले वक्त में सुनील वर्णवाल और मंजूनाथ भजंत्री जैसों की संख्या बढ़ने वाली है ।

” A Beurocrat must know how to say ‘no’ to his political masters” 

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