झारखंड के शहरों को 7-8 घंटे और गांवों को 5-6 घंटे मिल रही है बिजली

बिजली परियोजनाओं को लेकर गंदी राजनीति नहीं होती तो आत्मनिर्भर बन सकता था झारखंड- रघुवर दास
बिजली परियोजनाओं को लेकर गंदी राजनीति नहीं होती तो आत्मनिर्भर बन सकता था झारखंड- रघुवर

पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने वर्तमान मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को लिखी चिट्ठी

गर्मी में हर साल बिजली की डिमांड बढ़ती है, लेकिन पहले ऐसा गंभीर संकट नही देखा- रघुवर

जमशेदपुर। ।झारखंड में प्रचंड गर्मी के बीच बिजली संकट गहराता चला जा रहा है। गांव और शहर में लगातार पावर कट से जनता परेशान है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। बुजुर्गों और मरीजों का हाल बुरा हो गया है। हमारे समय में भी बिजली का संकट पैदा होता था, लेकिन पहले से की गयी तैयारी और योजना के कारण इनती अधिक लोड शेडिंग की अवश्यकता नहीं होती थी। ये बातें रघुवर दास ने सीएम हेमंत सोरेन को लिखी चिट्ठी में लिखी है ।

रघुवर दास ने लिखा है कि इस बिजली संकट के लिए आपके सरकार की निष्क्रियता जिम्मेवार है। वर्ष 2020 में इसी प्रकार का बिजली संकट उत्पन्न हुआ था, उस समय की घटना से आपकी सरकार ने कोई सीख नहीं ली। पहले से ही योजना बनायी जाती और टाटा पावर, डीवीसी या अन्य कंपनियों के साथ पीपीए कर लेना चाहिए था।

आंदोलन के नाम पर बिजली परियोजनाओं में बाधा उत्पन्न की गई 

रघुवर दास ने लिखा है कि झारखंड देश में सबसे बड़ा कोयला उत्पादक राज्य है। यहां से कोयला दूसरे राज्यों में जाता था और हम बिजली खरीदते थे। झारखंड से कोयले का नहीं बिजली दूसरे राज्यों में जाये, इसे ध्यान में रख कर भाजपा की डबल इंजन सरकार के समय पीटीपीएस, पतरातू और एनटीपीसी के बीच साझा समझौता हुआ। इसके तहत 2024 तक 4000 मेगावाट बिजली का उत्पादन शुरू हो जाना था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका शिलान्यास किया था। पहले चरण में 800 मेगा वाट बिजली का उत्पादन शुरू होना था, जो सरकार की निष्क्रियता और उदासीनता के कारण शुरू नहीं हो पाया है।

इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी ने एनटीपीसी के नार्थ कर्णपूरा का शिलान्यास किया था। लेकिन 10 साल तक केंद्र की यूपीए सरकार ने इस पर काम रोक दिया। 2014 में सत्ता संभालने के बाद माननीय मोदी जी ने इसे फिर से शुरू कराया। अब यह पावर प्लांट बनकर तैयार है, लेकिन राज्य सरकार के फोरेक्ट क्लियरेंस में यह मामला दो साल से लंबित है। इससे भी 800 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता। इसी तरह गोड्डा में निजी कंपनी अडानी के साथ 400 मेगावाट बिजली उपलब्ध कराने का करार किया गया था। लेकिन पिछले दो साल से कंपनी के अधिकारी पीपीए करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहें हैं, लेकिन सरकार को इसके लिए फुर्सत नहीं है।

बिजली संकट के लिए सरकार की निष्क्रियता जिम्मेवार 

राज्य के 24 जिलों में शहरों में औसतन 6-8 घंटे और गांवों में 4-5 घंटे बिजली मिल रही है। आपकी सरकार की निष्क्रियता और निकम्मेपन के कारण आज झारखंड की जनता बिजली और पानी के लिए त्राहिमाम कर रही है। आप से आग्रह है कि अभी भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए आगे की रणनीति बनायें और जनता को इस बिजली संकट से निजात दिलायें।

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